E20 Petrol: माइलेज से लेकर फ़्यूल सिस्टम तक उठे सवाल, सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है?

E20 Petrol: माइलेज से लेकर फ़्यूल सिस्टम तक उठे सवाल, सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है?

E20 Petrol: देशभर में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) को लेकर बहस लगातार तेज़ होती जा रही है। एक अप्रैल से पूरे देश में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री अनिवार्य किए जाने के बाद बड़ी संख्या में वाहन उपभोक्ताओं ने अपनी गाड़ियों के माइलेज और प्रदर्शन को लेकर शिकायतें दर्ज कराई हैं। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि जब बाज़ार में अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे वाहन मौजूद हैं जो मूल रूप से 10 प्रतिशत इथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए डिज़ाइन किए गए थे, तो ई20 को लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं की गई।

इस नीति को पहले वर्ष 2030 तक लागू करने की योजना थी, लेकिन इसे पांच वर्ष पहले लागू किए जाने के फैसले पर भी सवाल उठ रहे हैं। विवाद बढ़ने के बाद बीते शुक्रवार को पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्वीकार किया कि कुछ वाहनों का माइलेज 3 से 5 प्रतिशत तक कम हो सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि इससे इंजन या वाहन के प्रदर्शन पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता और इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम पूरी तरह सुरक्षित है।

ऊर्जा सुरक्षा और हरित ईंधन पर ज़ोर

सरकार का तर्क है कि इथेनॉल अपेक्षाकृत हरित ईंधन है, जिससे पेट्रोलियम आयात पर भारत की निर्भरता कम होगी। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह पहल ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हालांकि ई20 को लेकर बहस केवल माइलेज तक सीमित नहीं है। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, तेल आयात, किसानों की आय, जल संसाधनों पर प्रभाव, पर्यावरणीय पहलुओं और उत्पादन लागत जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे भी शामिल हैं।

दीर्घकालिक प्रभावों पर और अध्ययन की आवश्यकता

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम ‘द लेंस’ में ऊर्जा विशेषज्ञ स्वाति शेषाद्रि ने कहा कि इथेनॉल आधारित ईंधन विकास और जलवायु परिवर्तन, दोनों से जुड़े अहम प्रश्न खड़े करता है। ऊर्जा अर्थशास्त्र एवं वित्तीय विश्लेषण संस्थान (आईईईएफ़ए) से जुड़ी शेषाद्रि का मानना है कि इथेनॉल ईंधन के दीर्घकालिक आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर अभी और गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है।

कार्यक्रम में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने ऑटो विशेषज्ञ अमित खरे और पेट्रोलियम मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा से भी चर्चा की। नरेंद्र तनेजा भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पार्टी के राष्ट्रीय ऊर्जा प्रकोष्ठ के संयोजक भी रह चुके हैं।

ई20 की तकनीकी चुनौतियों पर ऑटो विशेषज्ञ की चिंता

ऑटो विशेषज्ञ अमित खरे का दावा है कि ई20 ईंधन की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती यह है कि इथेनॉल अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पानी को अवशोषित करता है। उनके अनुसार, जब ईंधन में नमी या पानी पहुंच जाता है तो कुछ परिस्थितियों में इथेनॉल और पेट्रोल का मिश्रण अलग होने लगता है, जिससे कई तरह की तकनीकी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

हालांकि सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि ईंधन में पानी पहुंचना किसी भी प्रकार के पेट्रोल के लिए नुकसानदायक होता है और यह केवल इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की समस्या नहीं है। सरकार का कहना है कि आधुनिक वाहनों में ऐसी व्यवस्था होती है जो सामान्य परिस्थितियों में ईंधन टैंक में पानी जाने से रोकती है।

फ़्यूल सिस्टम पर असर और बढ़ सकता है रखरखाव खर्च

अमित खरे के अनुसार, समस्या अक्सर ईंधन टैंक के भीतर ही शुरू होती है। उनका कहना है कि पानी और इथेनॉल के मिश्रण के कारण अशुद्धियां और गंदगी अपेक्षाकृत जल्दी जमा हो सकती हैं, जिससे फ़्यूल फ़िल्टर चोक होने का जोखिम बढ़ जाता है। यदि फ़िल्टर या फ़्यूल पंप प्रभावित होता है तो इंजन तक ईंधन की आपूर्ति बाधित हो सकती है और वाहन अचानक बंद भी पड़ सकता है।

उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में समस्या केवल फ़्यूल सिस्टम की सफाई या फ़िल्टर से जुड़ी होती है, लेकिन मरम्मत के बजाय पूरे फ़्यूल पंप को बदलने की सलाह दी जाती है, जिससे वाहन मालिकों का खर्च काफी बढ़ जाता है। उनके अनुसार, जब ग्राहकों को मरम्मत का बड़ा अनुमानित बिल मिलता है तो ई20 ईंधन को लेकर उनकी चिंताएं और बढ़ जाती हैं।

अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कहा कि दिल्ली में पिछले 18 महीनों से ई20 पेट्रोल का उपयोग हो रहा है। इस दौरान लोगों ने नियमित सर्विसिंग तो कराई, लेकिन कंपनियों ने सर्विसिंग के दौरान फ़्यूल पंप की सफाई को शामिल नहीं किया, जिससे समय के साथ समस्याएं बढ़ती गईं।

सबसे अधिक असर पुरानी गाड़ियों और दोपहिया वाहनों पर

पेट्रोलियम विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा और ऑटो विशेषज्ञ अमित खरे दोनों का मानना है कि ई20 पेट्रोल का सबसे अधिक प्रभाव पुरानी दोपहिया और चारपहिया गाड़ियों पर पड़ रहा है। वहीं, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की दीर्घकालिक लागत और लाभ को लेकर बहस अभी भी जारी है।

अमित खरे के अनुसार, माइलेज में कमी का मुख्य कारण इथेनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल की तुलना में कम होना है। हालांकि इथेनॉल का ऑक्टेन नंबर अधिक होता है, लेकिन प्रति लीटर उससे मिलने वाली ऊर्जा कम होने के कारण ईंधन दक्षता में गिरावट आती है।

उनका दावा है कि सबसे अधिक शिकायतें दोपहिया वाहन मालिकों से मिल रही हैं, जहां कई लोगों ने माइलेज में लगभग 10 से 12 प्रतिशत तक की कमी महसूस की है। वहीं 1500 सीसी से छोटे इंजन वाली कारों में माइलेज 8 से 10 प्रतिशत तक घटने की बात कही गई है। जबकि 2 लीटर या उससे बड़े इंजन वाली गाड़ियों में यह गिरावट अपेक्षाकृत कम, करीब 6 से 7 प्रतिशत तक बताई गई है। चूंकि भारत में छोटे इंजन वाली गाड़ियों की संख्या अधिक है, इसलिए यह बहस भी मुख्य रूप से इन्हीं वाहनों के इर्द-गिर्द केंद्रित है।

माइलेज के आंकड़ों पर अलग-अलग दावे

सरकार का कहना है कि माइलेज में गिरावट सामान्यतः 3 से 5 प्रतिशत तक सीमित रहती है। दूसरी ओर, अमित खरे का मानना है कि वास्तविक स्थिति दोनों दावों के बीच कहीं हो सकती है।

उनके अनुसार, सरकार नुकसान को कम करके बता रही हो सकती है, जबकि सोशल मीडिया पर कुछ उपयोगकर्ता अपनी समस्याओं को बढ़ा-चढ़ाकर भी प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी कारण आधिकारिक दावों और वाहन चालकों के अनुभवों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

वाहन कंपनियां फिलहाल सतर्क रुख में

अमित खरे का कहना है कि कार निर्माता कंपनियां इस मुद्दे पर फिलहाल नपी-तुली प्रतिक्रिया दे रही हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वाहन निर्माताओं के प्रतिनिधि मौजूद थे, लेकिन उनमें अधिकांश कॉर्पोरेट मामलों से जुड़े अधिकारी थे, तकनीकी या सर्विस विशेषज्ञ नहीं। ऐसे में ई20 के तकनीकी प्रभावों पर अधिक जानकारी सामने नहीं आ सकी।

उनके मुताबिक़, उद्योग जगत के कुछ लोगों का मानना है कि यदि ई20 से जुड़ी शिकायतें बढ़ती हैं तो भविष्य में उपभोक्ता केवल ईंधन कंपनियों ही नहीं, बल्कि वाहन निर्माताओं को भी जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। यही कारण है कि अधिकांश कंपनियां फिलहाल खुलकर कोई टिप्पणी करने के बजाय स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं और सरकार के अगले कदम का इंतजार कर रही हैं।

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