
Congress vs Samajwadi Party: साथ होकर भी आमने-सामने क्यों हैं दोनों दल? जानिए बयानबाजी, वोट बैंक और सीट बंटवारे की पूरी सियासत
Congress vs Samajwadi Party: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की आहट के साथ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज होती जा रही है। राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल ‘इंडिया गठबंधन’ के सहयोगी हैं, लेकिन यूपी की राजनीति में एक-दूसरे पर लगातार हमलावर नजर आ रहे हैं। राजनीतिक जानकार इसे केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक वर्चस्व, वोट बैंक और सीट बंटवारे की रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं।
गठबंधन में साथ, लेकिन यूपी में अलग-अलग सियासी संदेश
दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में दोनों दल अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। कांग्रेस के इमरान मसूद और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के बयानों के जवाब में सपा की ओर से भी लगातार तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
हाल ही में सपा प्रवक्ता आईपी सिंह ने सोशल मीडिया के जरिए राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि ‘मोहब्बत की दुकान’ चलाने वाले राहुल गांधी अपने सगे चाचा स्वर्गीय संजय गांधी की पुण्यतिथि पर न तो शांति वन गए और न ही उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने इसे परिवार के प्रति नफरत करार दिया। यह बयान उस समय आया जब इससे पहले कांग्रेस नेता इमरान मसूद सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर तीखे राजनीतिक हमले कर चुके थे।
2024 की सफलता के बाद शुरू हुई राजनीतिक श्रेय की जंग
2014 और 2017 के चुनावों में लगातार कमजोर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही उत्तर प्रदेश में अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही थीं। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने मिलकर बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन इसके बाद सफलता का श्रेय किसे मिले, इसे लेकर दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।
समाजवादी पार्टी का दावा है कि उसकी संगठनात्मक ताकत, मजबूत कैडर और अखिलेश यादव के सामाजिक समीकरण इस प्रदर्शन की मुख्य वजह रहे। वहीं कांग्रेस यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि राहुल गांधी की सक्रियता और पार्टी की बढ़ती स्वीकार्यता ने गठबंधन में नई ऊर्जा का संचार किया।
खोए हुए वोट बैंक को वापस पाने की कोशिश
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच मौजूदा खींचतान का संबंध केवल मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें पुराने राजनीतिक समीकरणों में भी हैं।
कांग्रेस के रणनीतिकार मानते हैं कि समाजवादी पार्टी का मौजूदा कोर वोटर, विशेषकर मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा, कभी कांग्रेस के साथ जुड़ा हुआ था। यही कारण है कि इमरान मसूद और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं, जिनसे पार्टी कार्यकर्ताओं में यह संदेश जाए कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है और किसी भी क्षेत्रीय दल की जूनियर पार्टनर बनकर राजनीति नहीं करना चाहती।
वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी को आशंका है कि यदि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस दोबारा मजबूत होती है तो उसका सीधा असर सपा के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ेगा। इसी वजह से सपा लगातार यह स्थापित करने की कोशिश कर रही है कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी का प्रभावी मुकाबला करने की क्षमता केवल उसी के पास है।
सीट बंटवारे और राजनीतिक वर्चस्व की असली चुनौती
विश्लेषकों की नजर में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच जारी बयानबाजी का सबसे बड़ा कारण आगामी विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा और राजनीतिक नेतृत्व की स्थिति है।
दोनों दल यह समझते हैं कि भाजपा जैसी मजबूत चुनावी मशीनरी का अकेले मुकाबला करना आसान नहीं है, इसलिए गठबंधन बनाए रखना उनकी राजनीतिक आवश्यकता भी है। हालांकि दोनों में से कोई भी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान कमजोर नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे भविष्य में गठबंधन की शर्तें तय करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
पश्चिम बंगाल चुनावों के बाद बने राजनीतिक माहौल ने भी इस बहस को नया आयाम दिया है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कमजोर पड़ने के बाद इमरान मसूद जैसे कांग्रेस नेता यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि क्षेत्रीय दलों को अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए कांग्रेस के साथ आना होगा। यही राजनीतिक संकेत उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी दिखाई दे रहे हैं।
कांग्रेस लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन के आधार पर विधानसभा चुनाव में सम्मानजनक सीट हिस्सेदारी चाहती है, जबकि समाजवादी पार्टी का मानना है कि राज्य में उसका जनाधार अधिक मजबूत है और इसी आधार पर सीटों का बंटवारा होना चाहिए।
विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ेगी सियासी हलचल
आने वाले महीनों में जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच विधानसभा चुनाव के लिए सीट बंटवारे पर औपचारिक बातचीत शुरू होगी, तब दोनों दलों के रिश्तों की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। फिलहाल दोनों पार्टियां गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक पहचान, वोट बैंक और भविष्य की भूमिका को मजबूत करने की कोशिश में जुटी हैं। यही वजह है कि सहयोगी होने के बावजूद दोनों दलों के बीच बयानबाजी और राजनीतिक टकराव लगातार देखने को मिल रहा है।

