
UP News: यूपी में दलित वोटों की जंग तेज: BJP-SP आमने-सामने, मायावती की रणनीति पर सबकी नजर
UP News: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन दलित वोट बैंक को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर हैं। राज्य की सियासत में एक बार फिर वही पुराना समीकरण केंद्र में आ गया है, जहां हर दल की नजर दलित मतदाताओं पर टिक गई है। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और भारतीय जनता पार्टी के बीच दलित वोटों को लेकर सीधी टक्कर दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि क्या मायावती का पारंपरिक ‘दलित किला’ अब भी सुरक्षित है या उसमें दरार पड़ चुकी है।
सपा-बसपा गठबंधन की फिर चर्चा
लखनऊ की राजनीतिक हलचल में इन दिनों सबसे अधिक चर्चा सपा-बसपा के संभावित समीकरण की है। 2019 में ‘बुआ-बबुआ’ की जोड़ी ने साथ आकर बड़ा संदेश दिया था, हालांकि चुनाव के बाद गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं टिक सका। अब एक बार फिर अखिलेश यादव के हालिया बयान ने नए राजनीतिक संकेत दिए हैं। उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा कि लोहिया और आंबेडकर की विचारधारा का साथ आना समय की जरूरत है और आने वाले दिनों में सपा-बसपा संबंध और मजबूत हो सकते हैं।
यह बयान ऐसे समय आया है जब बसपा के वरिष्ठ नेता रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा में शामिल हो चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे या तो मायावती के साथ संभावित समीकरण की जमीन तैयार करने की कोशिश मान रहे हैं या फिर बसपा के पारंपरिक वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।
बीजेपी का ‘मिशन दलित’
2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी ने दलित वोट बैंक को लेकर अपनी रणनीति में तेजी दिखाई है। पार्टी को यह एहसास हुआ कि केवल हिंदुत्व के मुद्दे पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसी कारण पार्टी का एससी-एसटी मोर्चा पूरे साल का कार्यक्रम तय कर चुका है।
बीजेपी संत गाडगे महाराज की 150वीं जयंती से लेकर बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती तक बड़े स्तर पर आयोजन की तैयारी कर रही है। साथ ही उदा देवी, झलकारी बाई और वीरा पासी जैसे दलित नायकों को भी प्रमुखता से याद किया जा रहा है, जिन्हें पहले मुख्यधारा की राजनीति में अपेक्षाकृत कम स्थान मिलता था। इसे पार्टी की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए दलित समाज में पैठ मजबूत करने की कोशिश है।
बसपा के सामने अस्तित्व की चुनौती
2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट तक सिमट गई थी और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका। राज्यसभा में भी पार्टी की स्थिति कमजोर पड़ने वाली है। ऐसे में मायावती के सामने साख और अस्तित्व दोनों की चुनौती है।
हालांकि बसपा सुप्रीमो सक्रिय नजर आ रही हैं। 15 मार्च को कांशीराम जयंती के अवसर पर लखनऊ और नोएडा में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। यह आयोजन केवल स्मरण समारोह नहीं, बल्कि संगठन की ताकत दिखाने का प्रयास भी माना जा रहा है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या बसपा का पारंपरिक वोटर अब भी उतनी मजबूती से पार्टी के साथ खड़ा है।
नरम रुख के पीछे सियासी गणित
दिलचस्प पहलू यह है कि बीजेपी और सपा, दोनों ही दल मायावती पर सीधे हमले से बचते दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव जब एक-दूसरे पर तीखे प्रहार करते हैं, तब भी मायावती के संदर्भ में उनका स्वर अपेक्षाकृत संयमित रहता है। राजनीतिक विश्लेषक इसे शुद्ध चुनावी गणित मानते हैं।
दोनों दल जानते हैं कि मायावती पर सीधा हमला करने से उनके कट्टर समर्थकों में नाराजगी पैदा हो सकती है। बीजेपी दलित वोटों को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहती है, जबकि सपा ‘पीडीए’—पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक—के जरिए व्यापक सामाजिक गठजोड़ खड़ा करने की कोशिश में है।
2027 की राह में निर्णायक होगा दलित वोट
उत्तर प्रदेश में 20 प्रतिशत से अधिक दलित मतदाता हैं, जो किसी भी चुनावी समीकरण को बदलने की क्षमता रखते हैं। बीजेपी ने 23 फरवरी से संत गाडगे महाराज की जयंती के साथ अपने अभियान की शुरुआत कर दी है, वहीं अखिलेश यादव होली मिलन कार्यक्रमों को ‘पीडीए मिलन’ का स्वरूप दे रहे हैं।
आने वाले महीनों में रैलियों, जयंती समारोहों और सामाजिक अभियानों के जरिए दलित मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिशें और तेज होंगी। 2027 का चुनाव भले दूर हो, लेकिन दलित वोट बैंक को लेकर शुरू हुई यह जंग अभी से संकेत दे रही है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है।

