
Brijbhushan Sharan Singh: ‘मेरे हाथों एक खून हुआ, पर पछतावा नहीं…’ बृजभूषण शरण सिंह के बयान से फिर गरमाई सियासत
Brijbhushan Sharan Singh: एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं। गोंडा के कैसरगंज से पूर्व सांसद रहे बृजभूषण शरण सिंह ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में अपने अतीत की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उनके हाथों केवल एक हत्या हुई थी और उसे लेकर उन्हें कोई पछतावा नहीं है। उनके इस बयान के सामने आने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है।
इंटरव्यू में किया घटना का उल्लेख
इंटरव्यू के दौरान एंकर ने उनसे पूछा कि उन्होंने अपने जीवन में कब-कब गोली चलाई है। इसके जवाब में बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि उनके जीवन में केवल एक ही ऐसा अवसर आया था जब उन्होंने गोली चलाई। उन्होंने दावा किया कि उनके एक मित्र को उनके सामने गोली मार दी गई थी।
उनके अनुसार, जब हमलावर उनकी ओर बंदूक लेकर मुड़ा, तब उन्होंने आत्मरक्षा या अपने दोस्त का बदला लेने की भावना से गोली चलाई। उन्होंने बताया कि दूरी बेहद कम थी और उसी घटना में एक व्यक्ति की मौत उनके हाथों हुई।
कानूनी कार्रवाई और बरी होने का दावा
सजा और कानूनी कार्रवाई को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि उस मामले में दोनों पक्षों से लोग मारे गए थे और क्रॉस फायरिंग हुई थी। उनके मुताबिक, अंततः मामला समाप्त हो गया और वे बरी हो गए।
पछतावे के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें किसी प्रकार का अफसोस नहीं है। उनका तर्क था कि यदि कोई व्यक्ति किसी को मारने की कोशिश करे तो उसका जवाब देना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
घोड़े के गिफ्ट पर भी दिया जवाब
इंटरव्यू के दौरान उनसे डेढ़ करोड़ रुपये के बताए जा रहे घोड़े के गिफ्ट को लेकर भी सवाल पूछा गया। इस पर उन्होंने कहा कि घोड़े की वास्तविक कीमत वही बेहतर बता सकता है जिसने उसे खरीदा है, चाहे वह डेढ़ करोड़ हो या बीस लाख। उन्होंने यह भी जोड़ा कि रेस के घोड़े सामान्य घोड़ों की तुलना में अधिक महंगे होते हैं।
ब्राह्मण–ठाकुर राजनीति पर जवाब
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण और ठाकुर समुदायों के बीच कथित राजनीतिक खींचतान को लेकर भी उनसे सवाल किया गया। इस पर उन्होंने कहा कि प्रदेश में इन दोनों समुदायों के बीच किसी प्रकार की व्यापक लड़ाई नहीं है।
उनके अनुसार, कुछ व्यक्तिगत घटनाओं के आधार पर पूरे समाज के बीच संघर्ष का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि गोंडा में ठाकुर मतदाताओं की संख्या निर्णायक नहीं है, इसके बावजूद वे छह बार सांसद रहे हैं। साथ ही, एक बार उनकी पत्नी और एक बार उनके बेटे ने भी चुनाव जीता है। उनका कहना था कि यदि जातीय टकराव की स्थिति होती तो वे चार दशक तक सक्रिय राजनीति में नहीं टिक पाते।

